#बेख़बर
मन में ही मन में सोचता है कुछ इस कदर की मुझे उसकी कदर नहीं,
तस्सली भरी निगाहों से देख तो ले मेरी रातों की नींद कैसी गुजरती है।
वो जो एक बार अंजान बन कर जता दे तो जिंदगी लिख दू उसे,
ख्वाहिश भी कहीं दिल में गहराई से कितनी छुपाई लगती है।
पता तो खुदका कहीं छोड़ आए सफ़र के दौरान में,
एक बार पीछे मूड कर जरा देख तो ले ये राहें जन्नत सी लगती है।
इंतहा , ख़यालो, बेचैनी क्या कुछ नहीं मेरे लिए उसकी यादों में,
खामोशियों से भरे अश्कों में डुब कर जीना मत, यहाँ महफ़िल भी तन्हा लगती है।
कैसे कहूं फिकर कितनी करता हूं में उसकी हर एक जीने की उम्मीद पर,
खुद खुदा से अपनी जान दांव पर लगा कर बेखबर हूं में, सायद यही एक बंदगी लगती है।
DEAR ZINDAGI 💞🌹