"गीत पुराना गाता हूँ"
एक और कश
फिर धुऐं में उड़ता
वो पत्थर |
अजीब सा कुछ
धड़कने भी चुप
कबके बीत जाते
उसे भी जी पाते
तन्हाई हमें करीब ले आती है
जीने की आदत बना जाती है
रंग घोलते हैं तन पर हजार
कीमत रुह की जाने क्या बाजार
मैं फिर तुम्हे पुकारता हूँ
गीत पुराना गाता हूँ ||