अज़ान के बाद अज़ान फिर नमाज़ होती है। खामोशी छा जाती है फिर कहां आवाज होती है।
बीत चुकी जिंदगी अब मरता मरता जीता हूं,
फितरत ये मोसमकी फजा के बाद कजा होती है।
कैसे भूला सकता हूं अपने चहीते मांजी को मै,
मयखाने के दो घूट से दर्द की आवाज होती है।
बुजते नहीं बुझती अक्सर बढ़ती जाती है अनिल,
पी के देखो ऐसी महोब्बत की प्यास होती है।