कभी कभी यूँ लगता है कि काश,
मैं अपनी उंगली तेरी हथेली पर फेर कर,
जादू से मिटा देता उस हर लकीर को,
जो तुझे ग़म देने वाली हो।
काश अपनी साँसों से तेरे माथे पर उकेरता,
एक ऐसा नसीब,
जहाँ तू आज़ाद हो।
काश तेरी आँखों को चूमता,
और भर देता उन्हें,
हज़ारों जुगनुओं के नज़ारों से।
काश तेरे सीने पर हाथ रख कर,
मैं एक गहरी साँस लेता,
और तेरा हर डर मिटा देता।
मेरे पास ऐसा कोई तिलिस्म नहीं,
जिससे ये सब मुमकिन हो।
मैं बस मुहब्बत करना जानता हूँ,
काश यह काफी होता।