(बारिश न होने पर बादल से संबोधित कविता)
ओ रे बादल महाराज
ओ रे निष्ठुर बादल..! आंखें फेर क्यों द्रुतगति से रहा चल।
अपने धरतीपुत्रों को तड़पते मरते देख आँखें नहीं होती सजल?
तूँ शुष्क है फीका है बेनूर, चल पड़ा अपना कर्तव्य छोड़ दूर।
पुत्र प्यासी नजर से देखते, कोसते, कहते बादल तुझे क्रूर।
ओ रे मगरूर, किसका गरूर है, चढ़ा है किसका सरूर?
किस के लिए संचित कर रहा, संभाल रहा है अपना जल।
अपने पूत्र की आर्द पुकार सुनकर तेरा ह्रदय नहीं जाता दहल?
तेरे रौद्ररूप से जाता रहा रूआब, तेरी छबी हो रही ख़राब।
अभी भी देर ना हुई आज अपनी आदतों से अब तूँ बाज।
एक एक बूंद के लिए सब मोहताज, बचा ले तेरी लाज।
ओ रे बादल भूल मत तेरा अस्तित्व-जीवन है किस काज?
प्रजा के मन से उठ रहा तेरा आधिपत्य, नष्ट हो रहा सामराज।
डावाँडोल हो रहा संसार दाव पर अब लगा है तेरा ताज।
तेरे विरूद अब उठने लगी जगह जगह से अब आवाज़।
तेरे खिलाफ बालकृष्ण बदल रहा भोली प्रजा का मिज़ाज।
अंतिम चेतावनी दे रहा है सुन ले ओ रे बादल महाराज।
-दीपेश कामडी 'अनीस'