दूसरों का दर्द समझना और दूसरों का दर्द कम करने के लिए खुद दर्द सहन करना तो हर स्त्री बचपन में तब सीख लेती है , जब वह गुड्डे गुड़ियों से खेलती है ।
लेकिन दर्द सहन करने की हर सीमा को स्त्री तब पार कर जाती है , जब वह एक बच्चे को जन्म देने के लिए प्रसव-पीड़ा को झेलती है ।
डॉ. कविता त्यागी