"लाओ मैं आपका ईलाज कर दूँ..."
मान लिया मन ही मन मैंने
उसे दिल का डॉक्टर 'हार्ट स्पेश्यालिस्ट'।
दिखा दिये दिल के दर्द सारे
कब कौन सा किस तरह लगा?
जख्म के जड़ को जानना जरूरी समझकर ।
हर दर्द की हिस्ट्री बता दी
कोई तो होगी इन दर्दों की दवा?
जहाँ जहाँ दुःखता था अँगुली रखी
मैंने कराहते हुए कहा "दुःखता है।"
"ईलाज कराने में दर्द तो सहना ही पड़ता है।"
और मैं आँखें बंद कर असह्य दर्द सहता रहा।
सोचा अंतिम बार दर्द सह लूँ।
सारे दर्दों से फिर तो मुक्ति...
फिर क्या था उसने कहा
"अगली बार आना..."
और इसी प्रकार मैं हरबार जाता रहा
अब तो मैं आजीवन दर्दी बन गया हूँ।
पता नहीं कौन था वह?
'हार्ट स्पेश्यालिस्ट' या 'हर्ट स्पेश्यालिस्ट'।
_दीपेश कामडी 'अनीस'