Hindi Quote in Blog by Roopanjali singh parmar

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अकसर आप, मैं और हम सभी स्त्रीत्व और स्त्रियों के अस्तित्व पर चर्चा करते हैं या उनके विषय पर लेख या कथा , कहानी पढ़ते और लिखते हैं।
लेकिन क्यों एक स्त्री पर ही लेख लिखा जाता है। समानता का व्यवहार चाहिए तो पुरुषों को भी समानता मिलनी चाहिए।
जब हम पुरुष वर्ग पर चर्चा करते हैं तो एक मजबूत इंसान की छवि हमारे समक्ष प्रस्तुत होती है।
ऐंसा क्यों है कि पुरुष हमेशा मजबूत बनें?
क्यों उनको भावुक होने का या रोने का अधिकार नहीं है?
भावनाऐं और संवेदनाएं दोनों ही तरफ समान होती हैं। भावनाओं में स्त्री-पुरुष का अंतर नहीं होता।
आपने लोगों को ये कहते सुना होगा कि लड़के रोते नहीं हैं।
क्यों लड़की की तरह रो रहा है?
ये तो पूरा लड़की है!
आँखों से गिरे चंद दुःख के आँसू ही एक पुरुष के अस्तित्व पर सवाल उठा देते हैं।
लोग तो यह भी कहते हैं कि मर्द को दर्द नहीं होता..
क्यों? क्या वो इंसान नहीं है?
क्या उसे तकलीफ नहीं होती?
यह बात दिमाग में बिठा दीजिये की मर्द को दर्द होता है और मर्द भी अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए रोता है।
एक लड़के को गुड़ियों से खेलने की स्वतंत्रता नहीं होती.. लेकिन क्यों नहीं होती?
एक खिलौना जो केवल बच्चे के मनोरंजन के लिए बना है, उसे भी आपने स्त्री-पुरुष के अस्तित्व से जोड़ दिया है।
एक पुरुष की निजी भावनाओं को स्त्री व्यवहार से जोड़ के पहले ही दोनों में दूरी बना दी जाती है और फिर आप चाहते हैं कि पुरुष, स्त्री की भावनाओं की कद्र कर, उन्हें समझे।
वही भावनाएं जो पुरुष के अस्तित्व पर हमेशा से सवाल उठा रही हैं।
हमारे समाज में बहुत अधिक दोहरी मानसिकता है। पुरुष का महिला के प्रति प्रेम ग़ुलामी कहा जाता है।
पुरुष का महिला को नौकरी करने से रोकना ग़लत है और नौकरी करने देना भी ग़लत है। नौकरी ना करने देने पर आप कहते हैं औरत की स्वतंत्रता को छीन रहा है और नौकरी करने देने पर कहते हैं कि औरत की कमाई खाता है।
अगर पुरुष ने औरत पर हाँथ उठाया तो वह पुरुष ज़ालिम है और अगर औरत ने पुरुष पर हाँथ उठाया तो पुरुष नामर्द बन जाता है.. की देखो वो औरत से पिट गया।
अगर औरत को स्वतंत्रता दे दी तो वह औरत के प्रति लापरवाह है, और अगर ज़्यादा परवाह करे तो शक्की मिजाज है।
तो अगर देखा जाए तो पुरुष के अस्तित्व पर तो आपकी वो सोच केंद्रित है, जिसका अपना कोई एक पक्ष ही नहीं है। आप अपनी सहूलियत के हिसाब से अपने स्वयं के विचार बदलते रहते हैं।
जिसमें पुरुष कुछ भी कहे ग़लत है, कुछ भी करे ग़लत है।

(वैसे तो शायद इसको हम पहले भी साझा कर चुके हैं। मगर हमारी पसंदीदा रचानाओं में से एक है, इस लिए दुबारा साझा कर रहे हैं।)

आभार🙏❤️🥀
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