मै यहीं ठहरी हुई हूँ!
कदमो का क्या ,
वो चल पड़े |
रास्ते बदले कई पर,
रंग मन का न गया |
कालिमा ही छा रही हैं,
सूरज उगे ,
किस काम का |
रात्रि मे पसरा हुआ है ,
शोर,शान्ति है कहाँ |
साँझ सा, यह मन मेरा,
घूरे जिसे है चन्द्रमा |
खूबसूरत मान, खुद को,
मुँह चिढ़ाता है मुझे |
प्रेम मे भूली हुई सब,
साथ छोड़ा न कभी |
मै यहीं ठहरी हुई हूँ!
कदम का क्या वह चल पड़े|