हृदय परिवर्तन
भारत के मगध राज्य में वीरसिंह नाम के एक राजा राज्य करते थे। वे बहुत ही कठोर, निर्दयी और अहंकारी व्यक्ति थे। उनका निर्देश था कि उनके महल के सामने से जो भी निकले वह महल की ओर देखकर, सिर झुकाकर राजगददी के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करते हुये अपने पथ पर आगे जाये।
एक महात्मा जी वहाँ से एक दिन अपना सिर झुकाये बिना ही अपने गंतव्य की ओर जा रहे थे। यह देखकर पहरेदार उन्हें पकडकर राजा के सामने ले आये। राजा तो घमंड में चूर चूर था उसने असभ्यता पूर्वक कडे शब्दों में महात्मा जी से सिर ना झुकाने का कारण पूछा।
महात्मा जी बोले राजन मेरा सिर सिर्फ प्रभु के सामने ही झुकता है यह सुनकर राजा ने कहा कि आपको यदि दंडस्वरूप सिर कलम करने की सजा दे दी जाये तो आपको कैसा लगेगा ? स्वामी जी ने निर्भयता पूर्वक चेहरे पर बिना किसी शिकन के अपनी पहले कही गई बात को ही दोहरा दिया। उनकी दृढता, साहस और आत्मबल को देखकर राजा भी चौंक गया। उसने दंभ पूर्वक महात्मा जी को कहा कि मेरे पास तो सबकुछ है धन,संपत्ति,वैभव,बल का साम्राज्य हैं। मैं भी तो प्रभु के समकक्ष हूँ, ऐसा क्या है कि जो उनके पास है और मेरे पास नही हैं, जिसके कारण तुम्हें अपनी जान की भी परवाह नही है। तम्हारी निडरता देखकर मैं आश्चर्य चकित हू।
महात्मा जी बोले राजा तुम्हे कोई प्रेम नही करता है तुम अपनी शक्ति के बल पर प्रजा का सर तो झुकवा तो सकते हो परंतु उनके मन में अपने प्रति प्रेम का प्रार्दुभाव नही कर सकते। राजा ने कहा कि मै इसकी जाँच करूगाँ तब तक के लिये इन्हें कारागार में बंद कर दिया जाये। उसी रात्रि में राजा अपना भेष बदलकर अपनी प्रजा के पास उनके बीच जाता है उसे यह जानकर बहुत दुख होता है कि उसकी प्रजा, उसके प्रति बहुत दुर्भावना रखती है एवं उससे घृणा करती है उनके मन में राजा के प्रति डर था और इसी कारण जनता जय जयकार करती थी, परंतु दिल से कोई भी अपने राजा को नही चाहता था बल्कि उसकी मृत्यु की प्रार्थना करते थे। यह सब कुछ जानने के पश्चात राजा का हृदय विषाद से भर गया और उसकी आँखां में आँसू आ गये, उसे अपनी कठोरता, अन्यायपूर्ण व्यवहार पर पश्चाताप होने लगा और उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है।
वह तुरंत भागता हुआ कारागार में पहुँच कर महात्मा जी के चरणों पर गिरकर अपने कृत्य के लिये माफी माँगता है उसकी आँखों में पश्चाताप के आँसू देखकर महात्मा जी कहते है कि तुम प्रेमपूर्वक,सदभावना के साथ अपनी प्रजा की देखभाल करते हुये राजकाज को संभालों। राजा महात्मा जी को वचन देता है कि वह उनके बताये मार्ग पर ही अब चलेगा और उन्हे स्वयं अपने साथ आदर एवं सम्मान पूर्वक अपने राज्य की सीमा तक छोडने जाता है।