महफ़िल में बैठकर एक शायर ,
कम कर रहा था अपने गम को ।
था आदत से परेशान जो हर जाम को ,
पिये जा रहा था उनके नाम पर ।
न रोक पाया आंसुओ के सैलाब को ,
न कि कद्र उस जालिमा ने तो क्या हुआ ,
मैखाने में बजी ताली उसी के नाम पर ।
क्या दुनिया है , क्या रीत दुनिया की ,
गुज़रे उसके राह से तो पत्थर फैका करते है ,
और यहीं वाह वाही करते है उनके नाम पर ।