वो बूंदे याद है मुझे
जो बचपन में
मन के आँगन को तरबतर
कर जाती थी
वो राम की नैया
पार लगाते कृष्ण कन्हैया
हाँ सब याद है मुझे
वो बारिश की बूँदे
याद है मुझे ।।
खिलखिलाते फूल मुस्कुराती धुल
तितलियाँ देख होती थी टूल
हाँ सब याद है मुझे
वो बारिश की बूंदे ।।
अब कहाँ है बारिश
मेरे मन के आँगन में
काट डाले गए मासूमियत
के पेड़ पौधे
हँसती धुल बेघर है
बस
बंजर सा मन है
जलन हीं जलन है ।।
मेघा अब भी घिरते है
मन खुश भी होता है
और कुछ ही पल में
तूफानी हवा आती है
और मेघ को तितर बितर कर जाती है
मन की आँगन सूखी हीं रह जाती है ।।
किंतु
हाँ बारिश की बूँदे
याद है मुझे ।।।
#अनंत