महाभारत
महाभारत, युद्ध का कोई पर्याय नहि, किन्तु पर्याय है; तो बस कर्म का और धर्म का! क्या कर्म होता है, क्या धर्म होता है और साथ ही में क्या परम होता है....राजा का वन में रहना, रानी का दासी बनना, ज्येष्ठ का कनिष्ठ बनना और शिष्ट का श्रेष्ठ बनना! एक अद्भूत प्रवास है जो अपने समय में,अपने समय से हमेंशा आगे चला....नियोग से संतान प्राप्ति, स्त्री और पुरुष में मित्रता होना, अपनी पसंद के पुरुष से विवाह करने समाज का भय न रखते हुए आगे बढ़ना, स्त्री से परामर्श लेना और इससे कई गुना और.....
धीर हूँ, मैं वीर हूँ,
शरीर हूँ गंभीर हूँ।
स्थिर हूँ मैं युध्द में,
अधर्म से अधीर हूँ।
हूँ बली , महाबली
मैं धीम हूँ मैं भीम हूँ।
मुष्टि का प्रहार हूँ,
मैं स्वर्ण, ना कथीर हूँ।
प्रखर से मैं प्रचंड हूँ,
शौर्य से अखंड हूँ!
समर्थ से भरपूर हूँ,
युद्ध में, मैं तीर हूँ।
भावि का मैं ज्ञान हूँ,
मैं मौन का विधान हूँ।
अश्व सा मैं तेज़ हूँ,
कुल से मैं रुचिर हूँ।
वीरता का वर्ण हूँ,
कवच हूँ मैं,मैं कर्ण हूँ।
भीष्म हूँ मैं शब्द से,
मैं सत्य से विदुर हूँ।
यज्ञ का वरदान हूँ मैं,
भिक्षा हूँ, स्वमान हूँ।
अंत का आदि हूँ मैं,
मैं रकतरंजित चीर हूँ!
ओ सारथि,मेरे सखा, हूँ
कर्म धारित ,तुच्छ हूँ।
चक्र के सानिध्य में,
अनंत हूँ मैं चिर हूँ...
© लीना प्रतीश