हम कहाँ बना पाते हैं सन्तुलन
दोनों पलड़ों में जीवन के,
दुःख भारी हो जाता है सुख से,
क्रोध हर लेता है हमारा विवेक,
हंसी छिप जाती है पीड़ा के पीछे,
प्रेम खो जाता है घृणा के आवेग में,
अपने रुठ जाते हैं अक्सर
तनिक स्वार्थ पूर्ति बाधा से,
जिस पर हमारा वश नहीं, अंततः
हार जाती है जिंदगी मौत से।
#संतुलन