प्रेम तेल में डूबके प्रियतम ,
बाती बनकर जलती रही मैं
तू भी कभी पतंगा बन जा
मिट्टी के जग दीप में जलकर
प्रेम-प्रकाश फैलाती हूँ मैं
अपनों के सुख की खातिर
स्वयं का अस्तित्व मिटाती हूँ मैं
नफरत का अंधकार दूर कर
प्रेम का पाठ पढ़ाती हूँ मैं
ढाई अक्षर प्रेम का पढ़कर
तू भी प्रेम का पंडित बन जा
प्रेम तेल में डूब के प्रियतम ,
बाती बनकर जलती रही मैं
तू भी कभी पतंगा बन जा
इस जग को जो भ्रम कहते हैं ,
प्रेम-खांड में पगे नहीं वे
धर्म का थोथा ढोल पीटते ,
मानवता के सगे नहीं वे
स्वार्थ के तम में फँसे हुए ,
परमार्थ प्रकाश में जगे नहीं वे
पर तू क्षुद्र स्वार्थ की कीचड़ छोड़के
जग में फूल कमल-सा खिल जा
प्रेम-तेल में डूबके प्रियतम
बाती बनकर जलती रही मैं
तू भी कभी पतंगा बन जा