अभिमन्यु का पराक्रम
बारह दिन बीत चुके अब तेरह का हुआ सूर्योदय
धर्म की कीमत से अज्ञात पाने चले पांडव विजय।
धाराधीश का आशीष ले रहा शीष झुकाकर धीर
धर्म का शर बन समर में अमर बनने चला वीर।
गुरु कृष्ण संग जा चुके पिता बनने त्रिगर्ता का काल
गुरु द्रोण संग रच चुके कौरव चक्र का महाजाल।
गुरु द्रोण के प्रण से रण का कण कण है गंभीर
धर्म का शर बन समर में अमर बनने चला वीर।
पाँचो पाण्डव महारथी केवल पार्थ व्यूह का ज्ञाता
चक्रव्यूह से अभिमन्यु का गर्भ से ही है नाता।
आवेश में प्रवेश का आदेश मांग रहा हो कर अधीर
धर्म का शर बन समर में अमर बनने चला वीर।
असहाय पाण्डव देख रहे अपनी सेना का विनाश
चक्रव्यूह के प्रहार से काँप रहा धरती -आकाश
पथ रोक रहा जयद्रथ का रथ स्वयं विवश है तकदीर
धर्म का शर बन समर में अमर बनने चला वीर।
महत्व उसके लिए पिता तथा गुरु केशव का मान
प्रवेश कर व्यूह में सौभद्र कर रहा शर-संधान।
हर क्रम पराक्रम से चला रहा त्रिविक्रम तीर
धर्म का शर बन समर में अमर बनने चला वीर।
रक्त पिपासु महारथी ,कर्ण ,द्रोण ,शकुनि अनेक
कृष्ण- शिष्य ,पार्थ पुत्र सोलह वर्षीय सिर्फ एक।
त्राण प्राण का किए बगैर शौर्य का प्रमाण वह तस्वीर
धर्म का शर बन समर में अमर बनने चला वीर।
बाणों की वर्षा में वह भीग रहा ,रक्त से भीग रहा कुरुक्षेत्र
अर्जुन के रथ में विराजे कृष्ण का भीग रहा राजीव नेत्र।
निकट संकट का आभास कर नटवर बहाए नयननीर
धर्म का शर बन समर में अमर बनने चला वीर।
गिरा धनुष तो उठी गदा ,गिरी गदा तो उठा तलवार
रक्त की नदियाँ बहती रही पर रुका नहीं शस्त्र प्रहार।
अंग अंग भांग था पर चक्र संग लड़ रहा उसका घायल शरीर
धर्म का शर बन समर में अमर बनने चला वीर।
लेने माँ का प्रतिशोध ,दिलाने पिता को इंद्रप्रस्थ
चक्रव्यूह मध्य खड़ा रहा जब तक हुआ नहीं सूर्यास्त।
लेकर अंतिम श्वास ,धर्म का आस,पास छोड़ गया पीर
धर्म का शर बन समर में अमर बनने चला वीर।
समग्र आर्यावर्त को दे गया शौर्य का परिचय
हर मनुष्य मरता है पर केवल कुछ बनते अजय।
पिता का गर्व वह ,सर्व लुटाकर,शौर्य का पर्व वह हीर
धर्म का शर बन समर में अमर बनने चला वीर।
धर्म युद्ध लाया विनाश ,मिट जाता समग्र कुरु वंश
यदि उत्तरा के गर्भ में न होता वीर अभिमन्यु का अंश।
पीकर कहर का ज़हर पिला गया कुरु-वंश को खीर
धर्म का शर बन समर में अमर बनने चला वीर।