औक़ात।
(एक वैचारिक लेख)
दिमाग़: सोच रहा हूँ कि किसी बड़ी शख्सियत के साथ अपनी फोटो डालू।
अन्तर्मन : क्यों?
इसका क्या लाभ है?
दिमाग़ से जबाब मिला-
'वैसे तो तुम्हें कोई पूछता नहीं।कम से कम इस बहाने पूछ लेंगे।
लाइक मिलेंगे और कमेंट भी। इस तरह तुम खुद को दूसरों के बीच बड़े लोगों से जान पहिचान वाले दिखा पाओगे,तुम्हारी दोस्तों में पैठ बनेगी।कुछ लोग जलेंगे भी'।
अन्तर्मन ने पूछा, 'फिर'।
जबाब कुछ मिल जाय,इंतजार करता रहा लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला।
दिमाग जबाब खोजता रहा लेकिन धुँआ ही धुँआ हवा के साथ दिख रहा था। धुयें से नदी किनारे जलती चिताओं का ध्यान आया।
लाशें चिताओं में जल रही थी। सब दूर ख़ड़े जलते शवों को देख रहे थे। एक दो आदमी जो होशियार थे,चिता विशेषज्ञ। वे जलते शव में बांस से मारकर कार्बन हटा रहे थे। ताकि इस झंझट से जल्दी छुटकारा हो और सब घर जल्दी जाय।
लाशों के परिचित अपने उदासीन हैं। कुछ सन्तुष्ट भी। यह सब देखकर।
वहाँ कई लाशें चिताओं पर नंगा करके लेटाई जा रही थी।इसी बीच जानकार लोग बार बार कह रहे थे बॉडी पर कोई कपड़ा या धागा तक न बंधा रह जाय।
ऊपर से सिर्फ एक कफ़न ओढा दो। बस्स।
अपने टुकुर टुकुर देखते रह जाते।
अंतर्मन ने दिमाग़ से कहा, "ज्यादा बन मत। तेरी औकात भी बस्स, उतनी ही हैं।सबके सामने नंगा होगा।और तेरे अपने करेंगे।ऊपर से ठीक से नहीं जला तो दो चार बांस लगेंगे।"
फिर क्या?
दिमाग को बड़ी शख्सियत के साथ फोटो डाल,झूठी शान बटोरने पर शर्म आ गई।और वह इस तरह उदासीन हो गया कि बनावटीपन से बचने लगा।
शम्भू
9-02-2020