"कुरुक्षेत्र"
प्रारंभ हुआ हे युद्ध,
आरंभ हुआ हे युद्ध,
युद्ध की जिसने खड़ा कीया मुझे मेरे अपनों के विरुद्ध,
मेरे परिवार के विरुद्ध,
मेरे रक्त के विरुद्ध,
हे क्रुष्ण कैसे बहाउ में अपना यह रक्त,
में हु बड़ी दुविधा में और सख्त,
ना यह युद्ध अब लड़ पाऊँगा में,
रखता हुं धरा पे धनुष और बाण,
यह हें मेरे युद्ध में पुर्ण विराम,
श्रीमदभगवदगीता में श्रीकृष्ण के मुख से उतर आया,
यादेवम् वेतीहंतारम् यशचय् मन्यदेहतम्,
उभहोतम् नविजानीतो नायमहंती ना हंयते,
तु मौत का गम क्यूँ करे,
प्रारंभ से तु क्यूँ डरे,
यह आत्मा मेरी तेरी,
यह जन्म और मृत्यु सभी,
क्यां सुर्य और क्या जमी,
समय चक्र से हि सब चली,
तेरे वस मे बस तेरा काम हे
बस कर्म पर अधिकार हे,
कर्म मे ही तेरी शान हे,
कर्म ही तेरी पहचान हे,
चल छोड़ मन की कमजोरियाँ,
चल छोड़ रिश्तों की मजबूरियाँ,
जीवन संघर्ष से बचना ही क्यां,
पाया क्यां हे केवल हे माया,
धलती जाये जो ऐसी हे छाया,
अग्नि जल वायु आकाश भुमी
बस पांच तत्वों का पिंजरा है काया,
इस पिंजरे में हंस हे जग रहा जो अजर अमर आत्मा है कहेलाया,
मृत्यु क्यां हे एक भ्रमण हे,मुड़ गया रे हंसा अपने घर आया,
फिर कीसी की काया मे बसने ने को आया,
आत्मा ही हे अजर अमर फिर क्यूँ घबराना,
छोड़ के यह काया तू पायेगा और एक नई काया,
तेरा समय चक्र यहा अब खतम हुआ,
मृत्यु क्यां हे एक भ्रमण हे मुड़ गया रे हंसा अपने घर आया।