कुछ ऐसा है महबूब मेरा.....
ग बिखेरे तितली जिस पर
भवरे जिसको राग सुनाएं
चांद सितारे देखें जिस को
परियां जिससे आंख चुराए
बाग भी जिससे खुशबू मांगे
इश्क जिसे महबूब बताएं
कमर पे मुड़ती नदियां जिसकी
सागर जिसकी आंख बनाए
समर छिड़े जिसके होंठो पर
हर रंग जिसे मिल कर खिल जाए
सूरज जिसका पहरा देवें
चांद भी जिसको नजर लगाएं
हिरनी जिससे चलना सीखे
जो सिंहनी को रौब सिखाएं
गिरे झरने जिसके कदमों में
बादल जिसका ताज बनाए
गाएँ जिसको मिलकर कोयल
मोर भी जिसको नाच दिखाएं
बाँटे रोशनी जैसे जुगनू
वो दुनिया में प्यार लुटाए
और कैसा सा महबूब मेरा है
कैसे तुमको बतलाऊँ मैं ?
बस यें समझो वो सरगम है
जिसको अब दिन भर गाँऊ मैं |
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