मैं प्रजा तू राजा है , तू राजा है ।
जिस सिंहासन पर बैठा है तू ,
वह हम दोनों का साझा है ।।
मैं प्रजा हूँ , तू राजा है । ।
शक्ति तेरे हाथों में है ,
सबकुछ तू कर सकता है
जन-हित को स्वधर्म बनाकर ,
प्रजा के दःख हर सकता है
सुर-साधक जन-स्वर सिद्ध कर दे !
जनमत का बाजा है ।
जिस सिंहासन पर बैठा है तू ,
वह हम दोनों का साझा है ।।
मैं प्रजा हूँ , तू राजा है ।।
छोड़के नब्बे लोगों के हित ,
स्व उल्लू सीधा करता है
आँखें मूँद दिल खोलके
दस लोगों के खाते भरता है
अनदेखी इतिहास की करके
अपराधी बन मरता है
तू ऐसा अपराध न करना ,
वक्त का बड़ा तकाजा है ।
जिस सिंहासन पर बैठा है तू ,
वह हम दोनों का साझा है ।।
मैं प्रजा हूँ , तू राजा है ।।
जाग चुका अज्ञान-नींद से ,
मेरे हाथ अब मेरी नियति है
तेरे दिये कष्ट भोगूँ मैं ,
इसमें मुझको आपत्ति है
वाद्य यन्त्र है तेरे हाथ में ,
पर सुर मैंने साजा है ।
जिस सिंहासन पर बैठा है तू ,
वह हम दोनों का साझा है ।।
मैं प्रजा हूँ , तू राजा है ।।
ऐसी बजा विधान की वीणा ,
सबको भोजन मिले पेट भर
सबके तन को कपड़ा मिल जाए ,
अपनी छत हो सबके सिर पर
धरती पर तब जन्नत होगी ,
मैं मानूँगी तू प्रभु ने भेजा है ।
जिस सिंहासन पर बैठा है ,
तू वह हम दोनों का साझा है ।।
मैं प्रजा हूँ , तू राजा है ।।