क्रोध से बुद्धि भ्रमित हो जाती हे,
विवेक नष्ट-भ्रष्ट हो जाता हे,
तब ऐसी दशा मे उससे यह आशा नहीं की जा सकती की वह ऐसा काम ना करेगा जो मानव समाज के लिये अहित सिद्ध हो,
ऐसा स्वार्थी अविवेकी अथवा उन्मत्त बुद्धि जन्म-जन्मातर न श्रेष्ठ बन शकता हे और न भगवानजी के भंडारे में विभूतियों का अधिकारी।
"जय सियारम"