परिवर्तन अच्छा था ।
शनैः शनैः आयु बढ़ रही थी ,
अनुभव अभी कच्चा था ।।
परिवर्तन अच्छा लगता था ।
कैशोर्य के निकट खड़ी थी
मैं छोटी प्राचीर बड़ी थी
परिवर्तन की प्रकृति से
नवांकुर जब फूट रहे थे
थोड़ा भय , थोड़ी जिज्ञासा थी ,
चंचल पल पीछे छूट रहे थे
वाणी में संकोच भरा था ,
चेहरा लिखा सच्चा था
परिवर्तन अच्छा था
कली नवोढ़ा , जग है टेढ़ा ,
रक्षा का है भार बड़ा
यह कह भावों में बहलाकर
मंडप में कर दिया खड़ा
बचपन का घर-गली छोड़कर
ससुराई में आना पड़ा
गृहस्थी समुन्दर , गहरा पानी ,
नाविक अभी बच्चा था ।
परिवर्तन अच्छा था ।।
एक जंजीर गले में पड़ गई ,
दो पैरों और हाथों में
आजादी जीवन की छिन गयी ,
सपने खो गये रातों में
गृह-पिंजरे में पंख टूट गए
उड़ना रह गया बातों में
माँ की ममता , स्नेह पिता का ,
पति-प्रेम गच्चा था ।
परिवर्तन अच्छा था ।।
घर में था गुरुभार गृहस्थी का ,
बाहर पहरा जमाने का
दायित्व आ गया नवसृजन कर ,
सृष्टि को आगे बढ़ाने का
जीवन जिम्मेदारी बन गया ,
रस भूली खेलने-खाने का
एक भाव अनमोल बना ,
वात्सल्य नया सच्चा था ।
परिवर्तन अच्छा था ।।
शनैः शनैः आयु बढ़ रही थी ,
अनुभव अभी कच्चा था ।
परिवर्तन अच्छा लगता था ।।