श्रेष्ठ कौन ?
“ अरे राकेश ! यह देखो, ये फूल कितने सुंदर और प्यारे है, इन्हें देखकर ही हमारा मन कितना प्रफुल्लित हो रहा है।“ यह बात शाला की क्यारी में लगे हुये फूलों को देखकर आनंद ने राकेश से कही। यह सुनकर फूल तने से बोला- देखो मुझे देखकर सब लोग मेरी कितनी तारीफ करते हैं, और मानव को मेरी कितनी आवश्यकता है। उसे जन्म से लेकर अंतिम यात्रा तक मेरी जरूरत रहती है। मैं पूजा स्थलों में परम पिता परमेश्वर के चरणों में स्थान पाता हूँ। ये सब बताते हैं कि मैं कितना श्रेष्ठ हूँ।
यह सुनकर तने ने कहा- मेरी ड़ाल पर ही तेरा जन्म होता है। यदि ये न हो तो तेरा अस्तित्व ही नही रहेगा, मेरी छाल का उपयोग अनेक औषधियों के निर्माण में होता है। मेरे से टिककर ही राह के पथिक विश्राम करते हैं। इन्हीं सब कारणों से मैं तुझसे ज्यादा श्रेष्ठ हूँ। अब दोनो में अपनी श्रेष्ठ को लेकर तू तू- मैं मैं होने लगी।
एक संत प्रतिदिन दोपहर को पेड़ की छाया में विश्राम करते थे। दोनो ने उनको अपनी व्यथा बतलाई और उनसे इस विषय पर अपना निर्णय देने का निवेदन किया। संत जी ने दोनो को समझाया कि अभिमान कभी नही करना चाहिए। इससे हमारा मान कम होता जाता है। फिर भी हम अपने को दंभ में महान समझने लगते हैं। आप दोनो यह सोचिये कि जल जिसके बिना आप दोनो का जीवन संभव नही है, उसे इस बात का कभी घमंड नही हुआ कि उससे ही जीवन है। वह बिना किसी स्वार्थ के सबको लाभ पहुँचाता है और मन में कभी महानता का दंभ नही रखता है।
हमें निर्विकार भाव से अपना कर्तव्य निभाना चाहिये। अब तुम दोनो खुद ही सोचो कि जल के सामने तुम क्या हो, यह सुनकर तने और फूल दोनो को अपनी गलती का अहसास हुआ और उनकी श्रेष्ठ बनने की भावना समाप्त हो गयी।