Hindi Quote in Story by Rajesh Maheshwari

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सच्ची तीर्थयात्रा


सेठ राममनोहरदास अपनी पत्नी के साथ सुखी जीवन व्यतीत कर रहे थे। वे ईश्वर के प्रति विश्वास तो रखते थे पर उनकी आस्था भक्ति के प्रति अधिक थी उनका विश्वास था कि मंदिर में दर्शन करने, साधु संतों के साथ सत्संग से ही मोक्ष प्राप्ति की आकांक्षा पूरी होती है। उनकी पत्नी में भी भगवान के प्रति गहरी आस्था और श्रद्धा थी। उनका मत था कि कर्म भावना प्रधान होना चाहिये। यदि जीवन में सच्ची भावना से कर्म नही किये गये हों तो ईश्वर की आराधना एक दिखावा है और मोक्ष प्राप्ति की आकांक्षा सपने के समान है।
एक बार सेठ जी चारों धाम की यात्रा पर जाने का मन बना बैठे क्योंकि उन्हें किसी महात्मा ने बताया था कि सिर्फ चारों धाम के दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। उन्होने अपनी पत्नी को भी चलने के लिये आग्रह किया परंतु उसने यह कह कर मना कर दिया कि मन चंगा तो कठौती में गंगा।
सेठ जी अकेले ही अपने नौकर को साथ लेकर यात्रा पर निकल गये। प्रत्येक तीर्थ स्थल पर भगवान के दर्शन, पूजन आदि हेतु उनकी मुलाकात वहाँ के पंडे, पुजारियों से होती है। उनकी कार्यशैली पूर्णतया धनोपार्जन की थी। जो भी यजमान उनको मुँह माँगा धन देता था उसे वे येन केन प्रकारेण भगवान की मूर्ति के निकट तक जाने का प्रबंध करा देते थे। वहाँ पर सामान्य भक्तों की कोई पूछ नही थी, उन्हें घंटों खड़ा रहने के बाद क्षणिक दर्शन करने का अवसर मिलता था। ऐसा प्रतीत होता था कि वहाँ पर भक्ति एवं श्रद्धा की भावनाओं का पूर्णतया अभाव था। यही सब उन्होने पवित्र नदियों में स्नान के दौरान देखा कि जो लोग पुण्य लाभ हेतु स्नान कर रहे थे वे अपने क्रिया कलापों से नदियों को प्रदूषित कर रहे थे। यह देखकर सेठ जी व्यथित हो गये। वे जिस सुख और शांति की खोज में आये थे वह तो प्राप्त नही हुयी अपितु ऐसा वातावरण देखकर मन खिन्न हो गया।
उन्हें अब अपनी पत्नी की बातें याद आने लगी कि पूजा, श्रद्धा और भक्ति पर आधारित होती है जिसमें भावनाओं का प्रभु के प्रति समर्पण ही सच्ची आराधना है और इसी से जीव को सच्चा सुख और सद्गति की प्राप्ति होती है। सेठ जी अपनी तीर्थ यात्रा पूरी करके वापस अपने गृहनगर लौट आते है। उन्होंने अपनी यात्रा का वृतांत पत्नी को बताते हुये स्वीकार किया कि कर्म में भावनाओं का होना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। सेठ जी अब धर्म से कर्म करने में विश्वास करने लगे।

Hindi Story by Rajesh Maheshwari : 111474070
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