#सच्ची_खुशी (लघुकथा)
कड़ी धूप में बच्चों के कपड़े साइकिल पर रखकर बेचकर वो अपने हालातों से टक्कर ले रहा था। आखिर 60 साल तक उसने हार नही मानी तो आज कैसे मान लेता। उसके इरादों और नेकनियती ने उसके बेटे को बड़ा आदमी बना दिया था , तो वो खुद क्यों कमजोर पड़ता। भले अब बेटा पूछता नही तो क्या उसने अपना फर्ज निभा दिया था। और उसने कभी ये सोचकर बेटे को नही पढ़ाया की कल को वो उसकी सेवा करे उसे फूलों पर रखे । उसने तो उसको समाज मे इज़्ज़त से रहने लायक बनाने के लिए अपनी सारी जवानी खपाई थी। वो तो कल भी यही काम करता था आज भी वही कर रहा है। भले अब उसके कपड़ो के खरीददार इतने नही हों। लेकिन स्वाभिमान उसकी पूंजी थी। पर आज लगता है खाली हाथ ही लौटना पड़ेगा। दिन भर से 1 भी कपड़ा नही बिका था उसका।
तभी एक घर से एक नोजवान निकलकर आया और उसने उस बूढ़े स्वाभिमानी से सारे कपड़े खरीद लिए। और उसको सभी कपड़ों के उचित दाम देकर उसके स्वाभिमान की रक्षा की।
शाम को वही नोजवान एक बस्ती में वही कपड़े गरीब बच्चों में बांट रहा था। चेहरे पर सच्ची खुशी ☺साफ झलक रही थी।
Atul Kumar Sharma " Kumar "