अतिथि -
बरस महीने दिन और रात साथ रहते हैं ,
पर कभी मुलाकात नहीं होती
हर छोटे-बड़े काम में संवाद होते हैं ,
पर कभी बात नहीं होती
दिन तो रोज होता है, (कर्तव्य निर्वहन हेतु)
पर कभी रात नहीं होती (विश्राम हेतु)
साँसें आज कुछ महकी-सी थी
लगा तुम लौट आये हो
मुडकर देखा , ज्ञात हुआ
यह तुम नहीं
हवा का हल्का झोंका था
पर आशा है मुझको
आज नहीं , तो कल
तुम लौट आओगे
तब मुलाकात भी होगी
परस्पर बात भी होगी
पर अतिथि के आने की तिथि ज्ञात नहीं होती