तमन्नाएं मेरी जब टकराई
पाबंदियों की दीवारों से
तो झुंझलाया छटपटाया मन
और फिर बन गया बाग़ी
तमन्नाओं की गठरी सारी बांधे
कमर को कस कर इरादों से
निकला बाहर दीवार फांदकर
ढूंढने लगा मैं अपने सारे सपने
यूं ही भागते दौड़ते यहां वहां
कुछ तमन्नाएं गठरी से बाहर अाई
और हौसलों के पंख लगाकर
उड़ने लगीं, छूने लगी आसमां
तब लगा मैं बौना सा हो गया
मेरा वजूद जाने कहां सो गया
और सपनों ने ले ली पहचान मेरी
उड़ते हुए सारी दीवारों से ऊपर
:- भुवन पांडे
#बाग़ी