गजल
काफिया .आ ।
रदीफ़ .न कर ।
चाँद तू इस तरह आकाश में मुस्कराया न कर ।
धरती पर जरा आ मुझें तडपाया न कर ।।
तेरी शीतल चाँदनी को यूँ दिखाया न कर ।
दिल की गर्मी तू यूँ बढाया न कर ।।
तू तो अपनी भोली सूरत दिखाया न कर ।
दिखा कर उसे फिर छुपाया न कर ।।
तू तो सुदंरता का खजाना अंखियों को लुभाया न कर ।
तेरी याद में अंखिया बरसे उसे रुलाया न कर ।।
तुझे देखकर गम भुलूं ऐसे दर्द दिया न कर ।
अंखियों में बसाया तुझे अब सताया न कर ।।
बृजमोहन रणा ,कश्यप ,कवि ,अमदाबाद ,गुजरात ।