विश्व पर्यावरण दिवस
सुबह टहलते हुए गंवई काका मिल गये, दुआ बन्दगी, नमस्ते सलाम हुआ। मैंने कहा काका का बात है जो तुम कहै चाहत हौ लेकिन पेट मा दबाये हौ। वैसे कौन सी चिंता है। काका नाराजगी के साथ बोले, का कही, बात चिंता की नही, बात है चिंतन की, छोड़ो तुम ना समझिहौ, मैंने कहा बताओ तो आखिर कौन बात है, हम काहे ना समझिबै। शायद आपका पता नही, हम लेखक और कवि हैं। काका बोले, पता है बहुत बड़े कवि हौ, फेसबुक पर दुइ चारि दोस्त यार, कुछ चेला चपाटी लाइक का कर देत हैं, बस लेखक बन गये। कभो चिंतन करो, चिंतन लिखो और कोई बदलाव करिकै दिखाओ तो जाने।
बेटा चिंता यही है, कि आजकल तुम्हारे जैसे फ़ेसबुकिया लेखकों के पास बस बातें हैं, करै को कुछ नही, कल को ही लै लेव, कल विश्व पर्यावरण दिवस रहै, जानत हो कि नही । मैं कहा अरे हाँ काका, मैंने भी तो फेसबुक पर लिखा था।
काका बोले, तो होइ गवा विश्व पर्यावरण दिवस, मनाय लिये, बस अब मजे से पेड़ काटो।
मैंने कहा अरे नही काका, किसान का बेटा हूँ पेड़ पौधों से तो पैदायसी नाता है, लेकिन विकास को देखते हुए जहाँ जरूरत है, पेड़ पौधे हटाने ही पड़ेंगे।
काका बोले, विकास और टेक्नोलॉजी के विरोधी तौ हमहू नही हैं, लेकिन जब पेड़ पौधे ही न रहिहैं, सांस लेय खातिर ऑक्सीजनै न होई, तो कैसा विकास?
मैंने कहा बात तो आपकी बिल्कुल सही है । तौ यहिका उपाय का है?
काका बोले, अरे! बेटा लेखक हौ कि बकलोल हौ?
तुम लेखक हौ तौ चिंतन करौ। खैर सवाल किए हो तौ जबाब भी सुन लेव। जरा सोंचौ अगर एक परिवार म चार आदमी हैं, वह 2000 स्क्वॉयर फ़ीट का मकान बनावत है, तौ आंगन बनाई के एक पेड़ नही लगाय सकत का। अगर हर परिवार सिर्फ अपने लिए पेड़ लगाय ले, तो का दिक्कत?
मैं आश्चर्यचकित था । काका का चिंतन वाकई चिंतनीय था ।
टहलते टहलते हम रामल्लू के घर के पास पहुंच गए। वह घर में लगे नीम के पेड़ की शाख़ें कटवा रहा था । काका से रहा नही गया और पूछ बैठे ये सब का कर रहे हो बेटा। रामल्लू बोला अरे! काका इस पेड़ से बेवजह करकट कूड़ा होता है, ना फल ना फूल, अगर पूरा पेड़ काटूंगा तो पुलिस बवाल करेगी, इसलिए शाख़ें झड़वा कर धीरे धीरे हटा देंगे। काका बोले तौ पेड़ से दिक्कत का है? नीम का पेड़ तो शीतल छाया देत है। रामल्लू बोला अरे! पेड़ के नीचे बैठता कौन है ? खालीमूली जगह घेरे है।
काका बोले अरे! बेटा, कल तुम्हारी पोस्ट पढ़ी बड़ा बढ़िया लिखत हो। खुद लिखे रहे या कॉपी पेस्ट किये थे, वइसे का लिखे थे थोड़ा भूल रहा हूं।
रामल्लू-अरे काका यही की "पेड़ बचाओ देश बचाओ"।
काका बोले बहुत अच्छी बात, लेकिन का तुम्हारा यह पेड़ विश्व पर्यावरण से बाहर है? रामल्लू के पास जबाब नही था।
फिर काका मुस्कुराए और बोले ठीक है बेटा, मनाव विश्व पर्यावरण दिवस। "पेड़ बचाओ, देश बचाओ"।
लेखक
लक्ष्मी नारायण "पन्ना"