दिन कुछ ऐसे गुज़ार रही हुँ |
जैसे कोई क़र्ज़ उतार रही हुँ ||
कतरा कतरा जी रही हुँ,
तिल तिल मर रही हूँ,
उनको भुलाने की नाकाम कोशिश कर रही हुँ |||
एक किसीके चले जाने से ज़िन्दगी ख़तम नहीं होती
जान कर भी अनजान हो रही हुँ |||
उनसे दूर रहने का सोच कर
उनके यादों के और करीब हो रही हुँ
अपने दिल को बार बार दुखा रही हुँ ||
ना जाने मैं यह कया कर रही हुँ
जैसे खुद को ही कोई सजा दिए जा रही हुँ
कहते हैं दिल के हातों कमज़ोर मजबूर होते हैं
मैं अपनी हार स्वीकार कर रही हुँ ||||