इक दिन इक मुरली वाला
मुरली बेचन गोकुल आया
मुरली की मीठी धुन सुनकर
कान्हा का जी भी ललचाया
बंशी की धुन से खींचा हुआ
कान्हा भागा सा जाता था
उस ओर जिधर मुरली वाला
मीठी सी मुरली बजाता था
उसने देखा इक वृक्ष तले
वो मुरली वाला रहता था
हाथों में कई मुरलियां लिये
वो सबको पुकारा करता था
नन्हा कान्हा जा बैठा पास
बोला मैं भी मुरली लूंगा
मुरली का जो भी मूल्य लगे
बाबा से लेकर दे दूंगा
ये मुरली कैसे बजती है
पहले मुझको भी सिखलाओ
अपने अधरों से छू करके
इक बार बजाकर दिखलाओ
मुरली वाला बोला कान्हा
तुम मुरली कैसे बजाओगे
अभी तो आयु में छोटे हो
ये काम नहीं कर पाओगे
लो इक छोटी सी मुरली
इसको अधरों से लगाओ तो
क्या इसको बजा तुम पाओगे?
तनिक मुझे दिखलाओ तो
कान्हा ने मुरली ली कर में
बाले हे माँ शारद वर दो
मेरी मुरली भी बोल उठे
मेरी मुरली को भी स्वर दो
फिर कान्हा ने उस मुरली को
अपने अधरों से ज्यों ही छुआ
मुरली से मीठी तान उठी
मुरलीवाला भी चकित हुआ
सातों सुर नतमस्तक हो
मुरली की धुन यूं नाचे
मानों वे भी थे धन्य हुए
जो कान्हा की मुरली बाजे
मुरली की धुन से सम्मोहित
सुरबालाएं भी थिरक उठी
पूरा गोकुल भी विस्मित था
आखिर ये कैसी तरंग उठी
जिसने भी उसकी तान सुनी
वो बेसुध होता जाता था
उसके सुर के सम्मोहन में
ब्रह्माण्ड झूमता जाता था
मुरली वाला करबद्ध खड़ा
आँखों से आँसूं बहते थे
किन्तु अन्तर के भावों को
दो अधर बोल ना पाते थे
कान्हा की मुरली की धुन से
शिव - ब्रह्मा भी हर्षाते थे
सुर समस्त करबद्ध खड़े
बस कान्हा का यश गाते थे