Quotes by Pawan Prajapati in Bitesapp read free

Pawan Prajapati

Pawan Prajapati

@vijendraoffsetgmailc


लघु कथा : यत्र नार्यस्तु पूज्यंते

पुरुषोत्तमलाल शहर के जाने माने वकील और नेता तो थे ही साथ ही एक बेहतरीन वक्ता भी थे। आज महिला दिवस की संध्या पर पर शहर में आयोजित एक सभा को सम्बोधित कर रहे थे।

''भाईयों और बहिनों! हम उस संस्कृति का हिस्सा है जहां नारी की पूजा की जाती है। 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवता:' अर्थात जहां नारियों की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं। इतिहास साक्षी है कि यहां नारी का अपमान करने वाले लंकेशों, दुर्योधनों व दुशासनों को अपने कुल सहित विनाश को प्राप्त होना पड़ा है। नारी शक्ति का केन्द्र है। हमें ऐसी गौरवशाली संस्कृति का हिस्सा होने पर गर्व है जिसने नारी को इतना सम्मान दिया है। आज कदाचित विश्व की किसी भी संस्कृति में नारी को वो सम्मान प्राप्त नहीं है जो हमारी संस्कृति में प्राप्त है।''

पुरुषोत्तमलाल धारा प्रवाह भाषण दे रहे थे, श्रोता भी मुग्ध होकर सुन रहे थे।

इतने में पुरुषोत्तमलाल का फोन बज उठता है और वो अपना उद्बोधन जल्दी समाप्त कर निकल जाते हैं।

पुरुषोतमलाल की पत्नी ने तीसरे बच्चे के रूप में कन्या को जन्म दिया था। दो बेटियां पहले से थी। जच्चा बच्चा दोनों स्वस्थ थे फिर भी पुरुषोत्तमलाल के चेहरे पर एक अजीब मायूसी थी। थोड़ी देर पहले नारी सम्मान पर बड़ी बड़ी बातें करने वाले पुरुषोत्तमदास उसी नारी के अपने घर आगमन पर प्रसन्न दिखाई नहीं दे रहे थे। कदाचित उन्हें इस बार बेटे की आशा थी। वे दिल पर बोझ लिये घर पहुॅंचे।

उस रात के अन्धेरे ने एक बार फिर शहर के मुँह पर कालिख पोत दी थी और 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते..' वाला वेद वाक्य सुबह होते होते शहर की किसी नाली में दम तोड़ गया।

अखबार के किसी छोटे से कोने में शहर में नवजात बच्ची का शव मिलने की खबर छपी थी।

Read More

बस यूं ही में कोई गीत गाता नहीं
हर किसी का भी गुणगान भाता नहीं
है कोई बात तुममें मेरे हमसफर
बस यूँ ही प्यार तुमपे तो आता नहीं

पवन प्रजापति

Read More

इक दिन इक मुरली वाला
मुरली बेचन गोकुल आया
मुरली की मीठी धुन सुनकर
कान्हा का जी भी ललचाया


बंशी की धुन से खींचा हुआ
कान्हा भागा सा जाता था
उस ओर जिधर मुरली वाला
मीठी सी मुरली बजाता था


उसने देखा इक वृक्ष तले
वो मुरली वाला रहता था
हाथों में कई मुरलियां लिये
वो सबको पुकारा करता था


नन्हा कान्हा जा बैठा पास
बोला मैं भी मुरली लूंगा
मुरली का जो भी मूल्य लगे
बाबा से लेकर दे दूंगा


ये मुरली कैसे बजती है
पहले मुझको भी सिखलाओ
अपने अधरों से छू करके
इक बार बजाकर दिखलाओ


मुरली वाला बोला कान्हा
तुम मुरली कैसे बजाओगे
अभी तो आयु में छोटे हो
ये काम नहीं कर पाओगे


लो इक छोटी सी मुरली
इसको अधरों से लगाओ तो
क्या इसको बजा तुम पाओगे?
तनिक मुझे दिखलाओ तो


कान्हा ने मुरली ली कर में
बाले हे माँ शारद वर दो
मेरी मुरली भी बोल उठे
मेरी मुरली को भी स्वर दो


फिर कान्हा ने उस मुरली को
अपने अधरों से ज्यों ही छुआ
मुरली से मीठी तान उठी
मुरलीवाला भी चकित हुआ


सातों सुर नतमस्तक हो
मुरली की धुन यूं नाचे
मानों वे भी थे धन्य हुए 
जो कान्हा की मुरली बाजे


मुरली की धुन से सम्मोहित
सुरबालाएं भी थिरक उठी
पूरा गोकुल भी विस्मित था
आखिर ये कैसी तरंग उठी


जिसने भी उसकी तान सुनी
वो बेसुध होता जाता था 
उसके सुर के सम्मोहन में
ब्रह्माण्ड झूमता जाता था


मुरली वाला करबद्ध खड़ा
आँखों से आँसूं बहते थे
किन्तु अन्तर के भावों को
दो अधर बोल ना पाते थे


कान्हा की मुरली की धुन से 
शिव - ब्रह्मा भी हर्षाते थे
सुर समस्त करबद्ध खड़े
बस कान्हा का यश गाते थे

Read More