आजकल कुछ अजीब सी कैफियत हो गई है।
ना जाने क्यूं कुछ ऐसी तबीयत हो गए है।
जिंदगी गुजार दी हमने पक्के नमाज़ी की तरह,
फिर भी क्यों ना मंजूर मेरी इबादत हो गई है।
मुर्दों के लिऐ कब्र मकबरा और आंसू भी है यहां, सिर्फ मतलब से रिश्ता रखना रिवायत हो गई है।
अब केसे पूछे उनसे जाकर क्यों खफा है हमसे,
अनिल ऐसी तो कया हमसे नादानियत हो गई है।