नज़दीकियां
तुम खुद से क़रीब ना आये थे
अपनी मर्ज़ी से जा भी ना पाओगे
हंसी लौटा भी दूं तु्म्हारी तो क्या
मैं वो नहीं जिसे तुम भूल पाओगे
आरजू है मेरी तुम्हें पाना
जुस्तजू है तुझमें समाना
फ़ना हो जाऊं राहें इश्क़ में
तभी याद रखेगा ये ज़माना
उन्हीं वीरानियों में कहीं फ़िर
मिलेंगे अपने ख़यालों के मेले
रंग होंगे जिनके इंद्रधनुषी
चटकीले से खिले - खिले
उन्हीं रंगों में ढ़ूंढ़नाा फ़िर मुझे
खुशबू में मिलूंगी मैं तुम्हें
रम जाऊंगी तु्म्हारी रूह में फ़िर
नशा बसा है मदिरा में जैसे ।
विनय ...दिल से बस यूँ ही