#Needy labours sufferings for survival..!!
My lockdown Poem..!!!
यारों जीदगीं आज ना जीदगीं लगती हैं
चार दिवारों में केंद्र पहली-सी लगती हैं
खानें को ग़म पीने को उदासी लगती है
हर शहर तन्हाई हर गली सूनी लगती हैं
चंद लम्होंकी मोहलत आज़ादी लगती हैं
आपसी दूरी जान की अमानत लगती हैं
दाल-सब्ज़ी सुकी रोटी प्यारी लगती हैं
नाकाम नाकारा घड़ियाँ बड़ी-सी लगतीं है
कटता नहीं वक़्त भूख भी बहूत लगतीं है
करे तो क्या करे प्रभु मर्ज़ी आपकी क्या
है क्या कोई जाने जान बोझ-सी लगती हैं
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