जुल्म हजा़र किये , अब कबुलात करता हुं
मुआफी लायक मैं हुं, बस मुआफी चाहता हुं
मेरे हर सितम को तुने, तोहफ़ा मान लिया है
सजा़ के लायक मैं हुं , बस मुआफी चाहता हुं
बहे गया हुं , शबनमी अहेसास लीए गाल पर
नजा़कत लायक तु है, बस मुआफी चाहता हुं
दफा हो जाती है सारी बलाएँ ,दिदारे यार सनम
दबादत लायक तु है, बस मुआफी चाहता हुं
तेरे हुश्न से ऱोशन होता है, दिल ए आशियाना
मैं अंधेेरों के लायक हुं, बस मुआफी चाहता हुं