#बढ़ना
चल -बढ़- चल अपने गांव, यहां कुछ नहीं तेरा।
चल थक मत मेरे पांव, राह नहीं रैन बसेरा।।
अभी चलना है तुझे, सफर लंबा बहुत है।
रास्ता अनजान है, डगर अचंभा बहुत है ।।
रौंद कर बढ़ेगा, कसारा की माटी।
लपक कर चढ़ेगा, इगतपुर की घाटी।।
नाशिक, भुसावल को, रग में समेटे।
इटारसी तक चलना, पग में लपेटे।।
तू पैदल है राही, नहीं हार जाना।
बुरा वक्त आया, इसे मार जाना।।
जबलपुर पहुंच कर, मुकद्दर से लड़ना।
अगर भाव खाये, तो तुम भी अकड़ना।।
आज मारा है समय ने, बहुत मजबूर हूं।
फिर भी हारा नहीं मै, मजदूर हूं।।
मै कटनी में काटूंगा, समय को पकड़ कर।
उस खूब डातुंगा, कलाई को जकड़ कर।।
तू मैहर में रुक जा, मां शारदा खड़ी है।
है महिमा निराली, बड़ी शुभ घड़ी है।।
सतना, मानिकपुर, दबे पांव बढ़ना।
प्रयागराज चल कर, धूप - छांव गढ़ना।।
मिर्जापुर में झुकना, मां विंध्यवासिनी हैं।
तिलक रज का करना, मां पाप नासिनी हैं।।
बनारस में ठहरो, आराम कुछ करो तुम।
है शिव को सब समर्पण, विश्राम कुछ करो तुम।।
अब गांव आ चुके हो, उत्तर प्रदेश घर है।
अब ज्योति ही चलेगा, यात्रा सदा अमर है।।
।। ज्योति प्रकाश राय ।।