दूल्हा
दूल्हा बनने की अभिलाषा,हर दिल में होती रहती है।
बिन दूल्हा बने हुये जग मे,सब सृष्टि अधूरी रहती है।
दूल्हा की मनोकामना को,कवि वर्णित नहिं कर सकता है।
दूल्हा बनने हित राघवेन्द्र भी, जनकपुरी जा सकता है।
दूल्हा दुल्हन की जोडी़ तो,गुण के अनुरुप सुहाती है।
बिन मेल मिलाप है किया वरण,नव दम्पति गर्त में जाती है
दूषित समाज में ये दहेज,दानव सा मुँह फैलाता है।
. हो शुचिता पूर्ण विवाह रस्म,पर दूल्हा बिकता जाता है।