"महसूस कर रही हूँ ,एक दस्तक ! दरवाजे की,
बन्द है जिसमे मौत का सामान सभी|"
महसूस कर रही हूँ ! विनास के उस राक्षस को ,
सो रहा अभी जो सागर मे , बन्द किये उस नेत्र को जो,
मानवताका अन्त समेटे , क्षण भर आवाज पर|
बहुत मेहनत हम करते हैं , विकास जिसे कहते है,
विकास और विनास का अन्तर मिटाती, उस भाषा,
उसके अर्थ को और उसके मूल मे छिपे अनर्थ को भी,
महसूस कर रही हूँ !"
महसूस कर रही हूँ ! सभ्यता के अन्त के आगाज़ को,
और प्राकृति के पुनः निर्माण को ,
#महसूस