संस्कृतियां बौनी हुई,बौना हो गया विश्व ।
सूक्ष्म जीव आगमन से बदल गया परिदृश्य ।।
सूनी सड़कें पूँछती कहाँ गए वे लोग ।
दौड़ चक्र है चुक गया यह कैसा संयोग ।।
जनमानस कैदी बना बना दिया घर जेल ।
नियति के एक दांव ने पलट दिया है खेल ।।
अस्त्र-शस्त्र सब व्यर्थ ही हाय बनाते आप ।
बिना तीर तलवार ही देत जीव संताप ।।
विश्व विजय की चाह में अब मत करना शोध ।
इस विध्वंसक कीट के शमन हेतु कुछ सोच ।।
आया इकलौता यहां जाएगा तू एक ।
सामाजिक दूरी बना होंना नहीं अनेक ।।
पृष्ठ भाग रक्तिम बने जिनके मन में चाह ।
देख रहे आरक्षक ऐसे जन की राह ।।