अब नहीं करूंगी शिकायत
वक़्त से, नियति से, अपने आप से,
कह नहीं सकती ये भी कि
चीजें मेरे हाथ से निकल गईं,
क्योंकि वे मेरे हाथ में आई ही नहीं,
आक्षेपों के तीरों को सहते हुए
आशंकाओं के अंगारों पर चलना है,
भविष्य के धुंधले रास्तों पर,
हमसफ़र का मानसिक अवलम्ब भी नहीं,
जूझती हुई स्व अवसाद से भी
महसूस करती हूं नितांत अकेली।
#नियति