एक औरत के शरीर को जितनी बार ढंकते हो,
उससे कहीं अधिक बार उघारते हो,
तुम जितनी बार उसे बचाने के जुमले गाते हो,
तुम उतनी बार उसे सड़कों पर उतारते हो,
हर एक युग में उन्हें बेचते आये हो,
सतयुग,त्रेता,द्वापर ,कलयुग और आगे न जाने कितने युग,
ये परम्परा के रूप में मिला उपहार है,
ओ ख़ुद को सारी में लपेटते जाए,
तुम उसे सारी में से खींचते जाओ,
फिर ये जो उसे ढंकते हैं,ओ कौन है?
क्या तुम उसे बचाने का ढ़ोंग रचते हो?
सिद्ध साहित्य