यूं तो महरूम थे रिश्तों से
यही नहीं तह उम्र रहे
पर पता ना था आज
कोई अपना हमारे बीच
ना रहे जान कर मन
हो उठा विचलित
पुराने पन्नों खुल गए
कुछ यादों का कारवां
चलने लगा तो गर्त
में कहीं थे दबे
हाथ से कुछ रहा था
गिर मैंने उंगली से
हथेलियों से पूछा
क्या हुआ बोली
एक उंगली ना रही
इससे हो रही बेबस
हथेली को पता
उंगलियों की क्या
है उपयोगिता
इसी में रिश्तों डोर
पकड़ रखी थी
किसी के जाने
का खामियाजा
यूं तो कोई नहीं
भर सकता
लेकिन हे प्रभु
शक्ति दे सहन
करने की बस
वक्त अब तू लगा
महरम जो नियति
किया यूं आधीन
#गुणवत्ता