कविता ..
दरवाजों खिडकियों से ,झाँकती जिदंगी ।
अनजानी मौत से ,भीख माँगती जिदंगी ।।
शहरों से अब ,पलायन करती जिदंगी ।
अपनो के पास ,अब जाना चाहती जिदंगी ।।
इस कदर खौफ ,पहले कभी नही देखा जिदंगी ।
अब तो छुने से ,पल पल डरती जिदंगी ।।
कभी सब हंसा करते थे ,महफिलों में जिदंगी ।
आज हंसने के पल ,खोज रही जिदंगी ।।
मैने जीवन में ऐसा ,मंजर कभी नही देखा ।
आज सड़क ,बाजार ,सूने मरधट से हुए जिदंगी ।।
ये जिदंगी बता ओर कितने ,खेल दिखायेगी ।
अब तो एक सांस के लिए ,तरसती जिदंगी ।।
जिंदा रहे तो फिर शहरों ,में जायेगे जिदंगी ।
अब तो जिंदा रहने ,अपने धर चले जिदंगी ।।
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