मन की बात,
मन में ही रह जाती है।
कई बार , जलाती है वो दिया
पर..
ना जाने जलते ही,
बुझ जाती है
मन की बात, मन में ही रह जाती है।
कोई तो आओ, इसे सुनने के लिए
तड़प जाता है, "मन"
कुछ कहने के लिए
बाढ़ आ जाती है, विप्पति की फिर
और उसी बाढ़ में वह,
बह जाती है।
मन की बात, मन में रह जाती है
जब होता नही कोई कहीं
तो वो चुपके से, आंसू
बनकर गिर जाती है
आक्रोश, अफ़सोस, डर, त्रासदी
के बाद , तौलिये में पुछ जाती है।
मन की बात, मन में ही रह जाती है
ढूंढ़ती है वो फिर कश्ती
और, दूर कहीं चली जाती है
फिर रुक जाती है वो कश्ती
झरने में खो जाती है
मन की बात, मन में ही रह जाती है।