धूप की होली:
धूप उस रोज भी आई थी,
मेरी खिड़की पर,
बहुत उदास सी,
यूँ ही सिमट के बैठी थी,
गरम, नरम सी थी,
तो प्यार से समेट लिया,
ठंड में पाई जो गर्मी,
तो साथ लेट लिया।
पिछले कुछ वक्त से,
हम यूँ ही साथ-साथ रहे,
न जाने क्या हुआ कि,
आज उसमें तल्ख़ी थी,
वो थी नाराज़ तो,
दूरी बना के रक्खी थी।
मैं उसके सामने था,
पर जरा उसने न देखा,
हमारे बीच उसने,
खींच दी थी एक रेखा।
मैं था हैरान,
कुछ भी समझ नहीं पाया,
तो अपनी बेरुखी का,
राज उसने यूँ बताया।
पिता (सूर्य) अब लौटते हैं,
फिर से घर (उत्तर) को,
मुझे है छोड़ना,
तेरे शहर को।
जरा सा रुक के,
फिर धीरे से बोली,
चली जाती अभी,
पर याद आया,
कल है होली।।