*दोहे*
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कंचन सदा पवित्र है, घटा न इसका दाम।
आता निर्धन के सहित, ईश्वर के भी काम।
मन के भाव पवित्र तो, निष्फल सब आरोप।
शुद्ध हृदय का क्या करे, राजा का भी कोप।
जान सका कोई नहीं, ईश्वर रचा विधान।
राजा को निर्धन करे, निर्धन देव समान।
जहाँ गुणों का हो नहीं, किंचित भी सम्मान।
वहाँ काम से काम ही, रखने में है ज्ञान।
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*अजय जादौन अर्पण*