मेरे चेहरे से जो जाहिर है बता भी न सकूं,
इस कदर दूर ना जाओ तुम्हें पा भी न सकूं।
मैं तो खुशबू हूं बिखरना है मुकद्दर मेरा,
तेरी मर्जी के मुताबिक नजर आ भी ना सकूं।
तुम ना आओगे तो क्या जान भी न जाएगी?
मौत कुछ तुम तो नहीं हो कि बुला भी ना सकूं।
गैर जाहिर को भी जाहिर किए देती है ग़ज़ल,
नहीं तो हाले दिल ऐसा है सुना भी ना सकूं।।
##प्रदीप ##
जाहीर##