हॊने में खोने का डर है,
जो है पास
उसे रखना है साथ
बस यह साथ ही मजबूरी है,
हमारी........
हर पल डरे-डरे से रहते है
ना जीते है
ना मरते है
बन्धन है बस सारे
पर आधार है जीवन का
जो पाना है
उसे निभाना हैं
एक आवरण बना लेते हैं
फिर मुक्ति के लिए भटकते हैं
बहुत कुछ जो त्यागना हैं
उसमें और बन्धते जाते हैं
मोह हैं होने का
आपना होने का
पर कहां हैं कुछ अपना
पर फिर भी डर हैं
उसे खोने का….....