यूँ ही फिसलती जा रही ज़िंदगी हाथों से और हम ख्वाब देखते रहे जलजला विचारों का आकर चला गया और हम गुबार देखते रहे वो आये और आकर चले भी गए और हम उनकी राह देखते रहे उम्मीदों का सूरज निकलेगा कभी तो और हम यूँ ही आस जोहते रहे ------------------------------#drvandnasharma